कांस्य काल : हड़प्पा एवं सिंधु घाटी की सभ्यता (2500BC-1750BC) Best Notes

सैंधव सभ्यता

हड़प्पा
  • बीसवीं सदी के द्वितीय दशक तक पाश्चात्य विद्वानों की धारणा थी कि सिकंदर के आक्रमण (326 ईसा पूर्व) के पूर्व भारत में कोई सभ्यता नहीं थी, परंतु इस क्षति के तृतीय दशक में इस भ्रामक धारणा का निराकरण हुआ जबकि दो प्रसिद्ध पुरातत्व शास्त्रियों ने दयाराम साहनी तथा रखलदास बनर्जी ने हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो के प्राचीन स्थलों से पूरा वस्तुएं प्राप्त करके यह सिद्ध कर दिया कि परस्पर 640 किलोमीटर की दूरी पर बसे हुए यह दोनों नगर कभी एक ही सभ्यता के दो केंद्र थे |
  • विगत महोदय ने इन्हें एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वा राजधानियां कहां है इस पूरी सभ्यता को सिंधु नदी घाटी की सभ्यता अथवा इसके मुख्य स्थल हड़प्पा के नाम पर हड़प्पा की सभ्यता कहा जाता है |
  • कुछ विद्वानों का विचार है कि चुकी इस सभ्यता का विस्तार सिंधु घाटी के बाहर बहुत बड़े चित्र में था अतः इसका नामकरण सिंधु सभ्यता के प्रथम स्थल के नाम पर हड़प्पा सभ्यता कहना अधिक उपयुक्त होगा |
  • सैंधव सभ्यता 2500 ईसा पूर्व के आसपास अपनी पूर्ण विकसित अवस्था में प्रकट होती है, यह केवल सिंधु नदी घाटी तक ही सीमित नहीं थी |
  • पाकिस्तान के बलूचिस्तान, सिंध तथा पंजाब के प्रांतों में सेंधव सभ्यता के कई पूरा स्थलों की खोज की गई है |
  • दक्षिणी बलूचिस्तान में सुत्कागेंडोर,सोत्काकोह तथा बालाकोट प्रसिद्ध पूरा स्थल है |
  • सिंध प्रांत में मोहनजोदड़ो तथा चन्हूदरो के अतिरिक्त कोटदीजी तथा जुड़ीरोदड़ो के पुरास्थल है | इसी प्रकार पंजाब में हड़प्पा के अतिरिक्त डेरा इस्माइल खान, रहमान ढेरी, सराय खोला, जलीलपुर के पूरा स्थलों से सेंधव सभ्यता के प्राचीन अवशेष मिलते हैं |

हड़प्पा एवं सिंधु घाटी की उत्पत्ति

  • आश्चर्य एवं खेद का विषय है कि इतनी विस्तृत सभ्यता होने के बावजूद भी इस सभ्यता के उद्भव और विकास के संबंध में विद्वानों में भारी मतभेद है |
  • अभी तक की खोजों से इस प्रश्न पर कोई भी प्रकाश नहीं पढ़ सका है कारण कि इस सभ्यता के अवश्य जहां कहीं भी मिले हैं अपनी पूर्ण विकसित अवस्था में ही मिले हैं |
  • सर जॉन मार्शल, गार्डन चाइल्ड, सर मॉर्टिमर व्हीलर आदि पुरा विधु की मान्यता है कि सिंधु सभ्यता की उत्पत्ति मेसोपोटामिया की सुमिरन सभ्यता से हुई इन विद्वानों के अनुसार सुमेरियन सभ्यता सिंधु सभ्यता से प्राचीन तिथि इन दोनों सभ्यताओं में कुछ सामान विशेषताएं देखने को मिली है जो इस प्रकार है-
    • दोनों नगरी सभ्यताएं हैं |
    • दोनों के निवासी कांस्य तथा तांबे के साथ-साथ पाषाण के लघु उपकरणों का प्रयोग करते थे |
    • दोनों के भवन कच्ची तथा पक्की ईंटों से बनाए गए थे |
    • दोनों सभ्यताओं के लोग चौक पर मिट्टी के बर्तन बनाते थे दोनों को लिपि का ज्ञान था |

सिंधु सभ्यता के प्रमुख तत्व

नगर तथा भवन

  • भारतीय इतिहास में नगरों का प्रादुर्भाव सर्वप्रथम सेंधव सभ्यता में हुआ था | नगर एक ऐसा विशाल जनसमूह होता है जिसकी जीविका प्रधानता उद्योग धंधों तथा व्यापार वाणिज्य पर निर्भर करती है |
  • व्यवसायिक उत्पादन के विनिमय द्वारा उसे ग्रामों से खाद्यान्न प्राप्त होता है |
  • हड़प्पा सभ्यता के नगरों की खुदाई पर विशेष ध्यान दिया गया है प्रमुख नगर जिनकी खुदाई की गई है- हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, चन्हूदरो ,लोथल, कालीबंगा, बनावली तथा धोलावीरा |
  • इन्हीं के आधार पर इस सभ्यता के नगर नियोजन तथा भवन विलास विन्यास की जानकारी प्राप्त की जा सकती है इनमें भी 6:30 उत्खनन मोहनजोदड़ो का ही हुआ है|

हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो

  • सिंधु सभ्यता के प्रमुख नगरों में मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा उल्लेखनीय है |
  • हड़प्पा संस्कृति पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के अंतर्गत साहिवाल जिले में स्थित है |
  • मोहनजोदड़ो उच्च कोटि के नगर निवेश का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं | उनका विधान दुर्ग के रूप में किया जाता है जिसमें परिखा, प्रकार, द्वार, अट्टालक, राजमार्ग, प्रसाद, कोष्ठागार, सभा, जलाशय आदि वस्तु के सभी तत्व प्राप्त होते हैं |
  • इन नगरों की खुदाई में पूर्व तथा पश्चिम में मिलते हैं, पूर्वी टीले पर नगर तथा पश्चिमी किले पर दुर्ग स्थित था |
  • नगरों के दुर्ग की और जोड़ी प्राची रो से गिरे थे लकीरों में तथा मुख्य दिशाओं में द्वार गोपुरम बनाए गए थे |
  • वी एसअग्रवाल ने पूर्व की पहचान ऋग्वेद में वर्णित असुरों के पूर्व स्थापित की थी इनका निर्माण एक सुनिश्चित योजना के आधार पर हुआ था |

वृहत स्नानागार

  • यहां मोहनजोदड़ो का सर्वाधिक उल्लेखनीय स्मारक है जो उत्तर से दक्षिण तक 54.86 मीटर तथा पूर्व से पश्चिम तक 33 मीटर है | इसके केंद्रीय खुले प्रांगण के बीच जलकुंड तथा जला से बना है |
  • यहां 39 फुट लंबा 23 फुट चौड़ा तथा 8 फुट गहरा है, इसमें उतरने के लिए उत्तर तथा दक्षिण की ओर सीढ़ियां बनी है जलाने की 4 सीटों से बनी है तथा दीवार की जुदाई जिप्सम से की गई है | जिप्सम तथा बिट्टू में को सुदृढ़ बनाते हैं |
  • विशाल स्नानागार भवन के दक्षिणी पश्चिमी छोर पर एक नाली थी जिसके द्वारा पानी निकलता था, जलाशय के तीन और बरामदे और उनके पीछे कई कमरे तथा गैलरिया थी, इन्हीं में एक कमरे में 2 की दोहरी पंक्ति से बनाया गया हुआ था जिससे स्नानागार में पानी भरा जाता था |
  • प्रत्येक कमरे में ईटों की बनी हुई मिलती है जिससे अनुमान किया जाता है कि इनके ऊपर दूसरी मंजिल भी रही होगी |
  • मार्शल ने इसे तत्कालीन विश्व का एक आश्चर्यजनक निर्माण बताया है |
  • डीडी कोसांबी वृहत स्नानागार की तुलना कालांतर के संस्कृत ग्रंथों में वर्णित कर अथवा कमल ताल से करते हैं जो धार्मिक संस्कार से संबंधित स्नान तथा शुद्धिकरण के अलावा राजा और पुरोहितों के अभिषेक के लिए आवश्यक माने जाते थे |

अन्नागार

  • स्नानागार के पश्चिम में 1.52 मीटर ऊंचे चबूतरे पर निर्मित एक भवन मिला है जो पूर्व से पश्चिम में 5.72 मीटर लंबा तथा उत्तर से दक्षिण में 22.86 मीटर चौड़ा है |
  • इसका ऊपरी ढांचा था जो शायद बास का बना था, अब नष्ट हो गया है |
  • इसे व्हीलर अन्नागार बताया है इसमें ईटों के बने हुए विभिन्न आकार प्रकार के 27 प्रकोष्ठ मिले हैं |
  • अन्नागार में हवा जाने के लिए स्थान बनाए गए थे, उसके उत्तर की ओर एक चबूतरा है जो अन्न रखने के तथा निकालने के समय उपयोग में लाया जाता होगा |
  • अन्नागार का सुदृढ़ आकार प्रकार हवा आने जाने की व्यवस्था तथा उसमें भरने की सुविधा आदि निसंदेह उच्च कोटि की थी विद्वानों का विचार है कि यह राजकीय भंडारागार था, जिसमें जनता से कर के रूप में वसूल किया हुआ अनाज रखा जाता था |
  • मिश्र तथा मेसोपोटामिया की सभ्यता में भी इस प्रकार के अन्नागार के अवशेष मिलते हैं |

चन्हूदरो

  • मोहनजोदड़ो के लगभग 130 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में स्थित एक स्थल की खोज 1934 ईस्वी में एनजी मजूमदार ने की तथा 1935 ईस्वी में मैंके द्वारा यहां उत्खनन करवाया गया |
  • सबसे निचले स्तर से सैंधव संस्कृति के अवशेष मिलते हैं |
  • यहां की मुख्य सड़क से 7.5 मीटर चौड़ी थी तथा मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की भांति यहां भी मकान सड़क के दोनों और बनाए गए थे |
  • मकान पक्की ईंटों के बनाए जाते थे तथा सभी गलियों में पक्की ईंटों से ढकी नालिया बनी थी मकानों में कमरे आंगन स्नान गृह शौचालय आदि होते थे ऐसा प्रतीत होता है कि यह एक औद्योगिक केंद्र था जहां मणि कारी मुहर बनाने का काम होता था |

सुत्कागेंडोर

  • पाकिस्तान के मकरान में समुद्र तट के किनारे स्थित यह सेंधव सभ्यता का सबसे पश्चिमी स्थल है |
  • इसकी खोज 1927 ईस्वी में स्टाइन ने की 1962 ईस्वी में जॉर्ज ने इसका सर्वेक्षण कर यहां से दुर्ग बंदरगाह तथा निचले नगर का पता लगाया |
  • इसका दुर्ग एक प्राकृतिक चट्टान के ऊपर स्थित था, इसकी दीवार में बुर्ज तथा द्वार भी बनाए गए थे यहां की बस्ती के आकार प्रकार से सूचित होता है कि मोहनजोदड़ो तथा कालीबंगा जैसा यह कोई बड़ा नगर नहीं है |
  • अपितु इसका महत्व एक बंदरगाह के रूप में था यहां से दो टीले मिलते हैं इसका आकार प्रकार भी सुत्कागेंडोर जैसे हि था कुछ मिट्टी के बर्तन मिलते हैं जो सैनधव बर्तनों के समान है |

मांडा

  • जम्मू से करीब 28 किलोमीटर की दूरी पर चेनाब नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित यह विकसित हड़प्पा संस्कृति का सबसे उत्तरी स्थल है |
  • 1982 में जेपी जोशी तथा मधुबाला ने इसका उत्खनन करवाया था |
  • यहां से तीन सांस्कृतिक स्तर प्राक्क सेंधव, विकसित सेंधव, तथा उत्तर कालीन सेंधव प्रकाश में आया है |

बनावली

  • हरियाणा के हिसार जिले में स्थित यह स्थल का उत्खनन 1973 से 74 में आर एस बिष्ट द्वारा करवाया गया |
  • ज्ञात होता है कि प्रारंभ से ही यहां के निवासी अपने घर सीधी दिशा में बनाते थे आगे चलकर दुर्ग प्राचीन एवं निकले नगर की अवधारणा भी विकसित हो गई इस चरण से एक पत्थर के बाद की खोज भी महत्वपूर्ण है बनावली के कई मकानों से अग्नि बेड़ियाँ मिलती है |
  • इनके साथ अर्धवृत्त आकार ढांचे है जिसके आधार पर कुछ विद्वान यहां मंदिर होने की संभावना व्यक्त करते हैं |
  • यहां की मोटी दीवारों के बीच आले तक बनाए गए हैं प्रायः सभी मकानों में के सामने चबूतरे बने हैं खुदाई में प्राप्त अन्य वस्तुओं में मृदभांड, मोहरे, टप्पे, चूड़ियां आदि सभी है |
  • मिट्टी का बना हल तथा कुछ लघु नारी मूर्तियां भी मिलती है, जो के दाने काफी मात्रा में पाए गए हैं |

रोपड़

  • पंजाब प्रांत में सतलज नदी के बाय तट पर स्थित यह भारत का ऐसा सेंधव स्थल है, जहां स्वतंत्रा स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सर्वप्रथम उत्खनन किया गया था |
  • इसका आधुनिक नाम रूपनगर है 1950 में इसकी खोज बीवी लाल ने की तथा 1953-55 के दौरान यज्ञ दत्त शर्मा ने इसकी खुदाई करवाई |
  • यहां संस्कृति के छह चरण मिलते हैं इनमें प्रथम ही सेंधव कालीन है |
  • यहां से इस सभ्यता के लगभग सभी पूरा अवशेष मृदभांड, सेलखड़ी की मुहर तीन विभिन्न प्रकार की मोहरों से अंकित एक छूरा, तांबे के बड़ाग्रां तथा कुल्हाड़ी आदि प्राप्त होते हैं |
  • एक ऐसा कब्रिस्तान मिला है जिसमें मनुष्य के साथ पालतू कुत्ता भी दफनाया गया है |

कालीबंगन

  • राजस्थान के गंगानगर जिले में घग्घर नदी के किनारे पर स्थित या सैंधव सभ्यता का एक महत्वपूर्ण स्थल है |
  • यहां 1961 ईस्वी में बीवी लाल तथा बी के थप्पड़ के निर्देशन में व्यापक पैमाने पर खुदाई की गई थी हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो के समान यहां से भी दो टीले मिलते हैं जो सुरक्षा दीवारों से घिरे हैं |
  • यहां की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि एक जूते हुए खेत की प्राप्ति है इसमें आड़ी तिरछी जुताई की गई है |

लोथल

  • हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो के अतिरिक्त यह भी सैंधव सभ्यता का एक प्रमुख स्थल है लोथल का टीला अहमदाबाद गुजरात जिले में सरगम नामक ग्राम के समीप स्थित है |
  • 1955 तथा 1962 के मध्य यहां एस आर राव के निर्देशन में वहां खुदाई की गई जहां जो मिल के घेरे में बसे हुए एक नगर के अवशेष प्राप्त हुए नगर दो भागों में विभाजित था -दुर्ग तथा निचला स्तर |
  • संपूर्ण बस्ती एक ही प्राचीर से गिरी थी प्राचीर के भीतर कच्ची ईंटों से बने चबूतरो पर घर बनाए गए थे |

सूरकोटदा

  • गुजरात के कच्छ जिले में स्थित इस स्थल की खुदाई से नियमित आवास केसाक्ष्य मिलते हैं |
  • अन्य नगरों के विपरीत यह नगर दूर-दूर की कृत भागो गढ़ी तथा आवास क्षेत्र में विभाजित था |
  • गढ़ी चित्र में भवनों का निर्माण ठोस मिट्टी के चबूतरे पर किया गया है तथा यह आवासीय क्षेत्र के भवनों से बड़े हैं |
  • गढ़ी की सुरक्षा दीवार में प्रवेश द्वार थे -एक दक्षिण की ओर तथा दूसरा पूरब की ओर |
  • यहां से पत्थर की चिनाई वाले भवनों के साथ भी मिलते हैं |

धौलावीर

  • गुजरात के कच्छ जिले के बचाव ताल्लुक में स्थित इस स्थल की खुदाई से यह सिद्ध हो गया कि सैंधव सभ्यता का सबसे प्राचीन और सर्वाधिक सुव्यवस्थित खूबसूरत तथा सबसे बड़ा नगर संभवत पाकिस्तान में पड़ने वाला मोहनजोदड़ो नहीं बल्कि भारत में पड़ने वाला धोलावीरा था |
  • सर्वप्रथम 1967-18 में धोलावीरा की खोज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के जेपी जोशी ने की तथा 1990-91 के दौरान आर एस बिष्ट द्वारा यहां व्यापक पैमाने पर उत्खनन कार्य प्रारंभ किया गया जो कई वर्षों तक चलता रहा |
  • धोलावीरा तीन भागों दुर्ग, मध्यम नगर, तथा निचला नगर में विभाजित था | संपूर्ण क्षेत्र को गिरती हुई चारों दिशाओं में बाहरी दीवारें बनाई गई थी |
  • जबकि प्रत्येक क्षेत्र की अपनी अलग किलेबंदी भी थी 70 से 140 मीटर विशाल खुले चित्र थे जो आंतरिक एवं बाहर प्राचीरो से महत्वपूर्ण स्थानों पर जुड़े हुए थे |

देसलपुर

  • कच्छ क्षेत्र में मोहनजोदड़ो तथा लोथल के बीच स्थित या सैंधव सभ्यता के सबसे पश्चिमी स्थलों में से है |
  • 1964 ईस्वी में केसी सौंदर्राजन ने यहां उत्खनन करवाया था, यहां से एक सुरक्षा प्राचीन मिली है इसमें स्थान स्थान पर बुर्ज बने हुए हैं |
  • महत्वपूर्ण अवशेष मिट्टी तथा जेस्पर के बाट, गाड़ियों के पहिए, तांबे की छुरियां, छेनी, अंगूठी तथा सेलखड़ी और तांबे की एक-एक मुहर आदि है |

दैमाबाद

  • महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में प्रवरा नदी के बाएं किनारे पर स्थित इस स्थल की खुदाई से सैंधव सभ्यता के कुछ साक्ष्य प्राप्त होते हैं इनमें कुछ मृदभांड सैंधव लिपि की एक मुहर, प्याले, तश्तरी आदि है |
  • कुछ बर्तनों पर दो सींगो की आकृति बनी है सैंधव प्रकार का एक मानव शवाधान भी मिलता है जहां 1 गर्त में युवा पुरुष का शव पाया गया है इसे उत्तर दक्षिण में लिटाया गया है |
  • गर्त में ईटे की चिनाई करने के बाद उसे मिट्टी तथा ईट एसे ढका गया है तथा कब्र के उत्तर की ओर एक पत्थर भी रखा गया है |
  • उल्लेखनीय है कि सुरकोटड़ा की कब्रों में भी पत्थर लगाए जाते थे दायमाबाद सेंधव सभ्यता का सबसे दक्षिणी स्थल है ऐसा लगता है कि यहां सैंधव निवासी उत्तर काल में आए थे |

आलमगीरपुर

  • उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित यहां के एक टीले की खुदाई से सेंधव सभ्यता के अवशेष मिलते हैं |
  • यहां इस संस्कृति के उत्तर कालीन स्तर का द्योतक है, खुदाई में मृदभांड तथा मनके मिले हैं यहां से कोई मुहर नहीं मिलती एक गर्त से रोटी बेलने की चौकी तथा कटोरे के बहुसंख्यक टुकड़े प्राप्त हुए हैं |
  • कुछ बर्तनों पर मोर, त्रिभुज, गिलहरी आदि की चित्र कार्य मिलती है आलमगीरपुर से सेंधव अवशेषों की प्राप्ति यह सिद्ध करती है कि यह सभ्यता गंगा यमुना दोआब में भी फैली हुई थी |

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