प्रबोधन-अर्थ, परिचय,विशेषताएं तथा प्रभाव संपूर्ण जानकारी 18th Important

प्रबोधन-अर्थ

प्रबोधन
प्रबोधन(विश्व का इतिहास)-अर्थ, परिचय, प्रमुख विशेषताएं
  • प्रबोधन का शाब्दिक अर्थ होता है जागृति | विश्व इतिहास में प्रबोधन का तात्पर्य 17 वी सदी के विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्र में आने वाली जागृति से है |
  • 17 वी सदी के वैज्ञानिक अन्वेषण और तर्कवाद पर आधारित विचार ने ईश्वर, मानव सृष्टि एवं विश्व संबंधी विचारों को ध्वस्त कर दिया |
  • इसके परिणाम स्वरूप एक नए विश्व का उदय हुआ जो तर्कवादी, यांत्रिक दृष्टि से परिपूर्ण एवं अवैयक्तिक परंतु मानवीय और सहिष्णु थी |
  • प्रबोधन पुनर्जागरण का अगला चरण था | उसी मध्यवर्ग की अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता था जिसने वाणिज्यवाद के प्रारंभिक चरण में दुर्बल होने के कारण मध्ययुगीन जीवन पद्धति का विकल्प सुझाया परंतु उसका खंडन नहीं किया गया था |

प्रबोधन-परिचय

  • 18वीं सदी का उत्तरार्ध पश्चिमी विश्व में क्रांति का युग था | अमेरिकी क्रांति, फ्रांस की क्रांति और नेपोलियन बोनापार्ट के सैनिक अभियानों पर क्रांतिकारी का प्रभाव हुआ |
  • इन क्रांतिकारी घटनाओं का प्रेरणा स्रोत 17 वी- 18 वी सदी की बौद्धिक क्रांति थी | 18 वी सदी के यूरोप में क्रांतिकारी परिवर्तनों के कारण ज्ञानोदय या विवेक का युग प्रारंभ हुआ अर्थात चिंतन एवं प्रयोग पर आधारित विचारधारा प्रचलित हुई |

प्रबोधन-प्रमुख विशेषताएं

  • प्रबोधन के चिंतकों अपने ज्ञान को प्राकृतिक विज्ञान के साथ जोड़ दिया | घटनाओं के कारणों की खोज प्राकृतिक एवं सामाजिक वातावरण पर मनुष्य का नियंत्रण बढ़ाने के साधन के रूप में की जाने लगी |
  • प्रबोधन युग के चिंतकों ने मानव की प्रसन्नता और बलाई पर बल दिया | ज्ञानोदय के चिंतक स्वतंत्रता व स्वच्छंदता के समर्थक थे | प्रबोधन ने प्रकृति के महत्व को प्रतिपादित किया |
  • प्रबोधन मानव की बौद्धिक चेतना में विश्वास करने के कारण यह विश्वास करता था कि उससे उसका प्राकृतिक अधिकार मिलना चाहिए लेकिन प्राकृतिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए इसने प्राय क्रांति के स्थान पर क्रमिक सुधार का विकल्प सुझाया |
  • दार्शनिकों के मतानुसार सामान्य मानव बुद्धिमान होता है लेकिन समस्या यह होती है कि वह बुद्धि के निर्णय को प्रायः इसलिए अस्वीकार कर देता है क्योंकि परंपरा के पालन में उसे सुरक्षा का भाव महसूस होता है तथा परिवर्तन की स्थिति में संभावित संकटों से वह डरता है |
  • बुद्धि ने व्यक्ति को चर्चा द्वारा निर्देशित नैतिकता के स्थान पर एक वैकल्पिक नीति का आधार प्रदान किया जिसमें मानव और ईश्वर के बीच संबंधों का निरूपण नए तरीके से होने लगा तथा इस नवीन अंतर संबंध में उत्पादन धन संग्रहण और उपभोग के नए प्रतिमान स्थापित किए |
  • सृष्टि अथवा विश्व कहा जाने वाला यह आश्चर्यजनक तंत्र किसी संयोग का परिणाम नहीं हो सकता | किसी अनंत देवी शक्ति ने इसका निर्माण और विस्तार किया होगा |
  • मनुष्य का सीमित मस्तिष्क अनंत को नहीं जान सकता अर्थात ईश्वर ज्ञान से परे है अपने आदर्श यांत्रिक नियमों को संचालित करने के पश्चात अवयक्तिक है |

प्रबोधन का प्रसार

  • 18 वीं सदी तक आते-आते प्रबोधन का प्रसार यूरोप में अन्य देशों के साथ अमेरिका एवं एशियाई महाद्वीपों में भी हो गया | अमेरिका में प्रबुद्ध चिंतन के विकास को शिक्षा, पत्रकारिता एवं विचार का विशेष योगदान प्राप्त हुआ |
  • अमेरिका में प्रबोधन की अभिव्यक्ति यूरोप से थोड़ी भिन्न रही क्योंकि यहां पर कुछ विचार को कुछ अन्य विचारों की तुलना में अधिक महत्व प्राप्त हुआ | अमेरिका के प्रबुद्ध विचारको को जेम्स लोगन और बेंजामिन फ्रैंकलीन के द्वारा अत्यंत सहयोग मिला | लोगन उपनिवेशों का सचिव तथा महान पुस्तक प्रेमी था |
  • उसने स्वयं के संसाधनों से एक पुस्तकालय तैयार करवाया था | फ्रैंकलिन ने बौद्धिक विकास के लिए जोंटो नामक क्लब का गठन किया | इसी जूनटो क्लब से कालांतर में अमेरिकन फिलोसॉफिकल सोसाइटी का जन्म हुआ |
  • 18 सदी में अमेरिका की बौद्धिक चेतना के विकास में सैमुअल ऐडम्स हेनरी पैट्रिक और थॉमस पेन का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा | राजा राममोहन राय 17721833 ईस्वी आधुनिक भारत में पुनर्जागरण के प्रमुख अग्रदूत थे |
  • बुद्धिवादी वैज्ञानिक दृष्टिकोण मानव की गरिमा तथा सामाजिक समानता के सिद्धांतों को आधार बनाकर सामाजिक सुधार करने वाले प्रथम व्यक्ति थे इसलिए उन्हें आधुनिक भारत का जनक, प्रबोधन का प्रणेता आदि कहा जाता है |
  • जापान में प्रबोधन के प्रसार को मेइजी शासन की पुनर्स्थापना 1874 ईसवी के साथ देखा जा सकता है | मेइजी काल में 33 बुद्धिजीवियों को मिलकर मेरो कुशा नामक संस्था की स्थापना की इस संस्था की स्थापना का उद्देश्य जापानी सभ्यता तथा प्रभुदत्ता को बढ़ावा देना था |
  • स्त्री शिक्षा प्रसार के फलस्वरूप जापान में स्त्रियों के जागरण और उनकी सामाजिक स्थिति में परिवर्तन होने लगा | बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ से ही स्त्रियां स्वयं कामकाज करने लगी तथा आर्थिक दृष्टि से भी स्वावलंबी होने लगी |
  • चीन में प्रबोधन का विकास धीरे-धीरे हुआ युग विंग पहला चीनी था जो 19वीं शताब्दी में पढ़ने के लिए अमेरिका गया | यहां पर प्रबोधन का प्रभाव आत्मसबलीकरण आंदोलन के रूप में प्रकट हुआ |
  • इस आंदोलन का उद्देश्य चीन का आर्थिक विकास एवं आधुनिकीकरण था ताकि पश्चिमी शक्तियों का सामना सफलतापूर्वक किया जा सके |

प्रबोधन का प्रभाव

  • प्रबोधन के फल स्वरुप राजा को लोक कल्याणकारी राजत्व का समर्थन करना पड़ा | समाज में प्रगतिशिलता का संचार होने लगा तथा आर्थिक गतिविधियों में आम नागरिकों की भागीदारी होने लगी |
  • जनसाधारण की शिक्षा की उन्नति, कृषक दासो का उत्थान, साहित्य का विकास, कठोर दंड विधान में सुधार, निर्धनता का उन्मूलन, चिकित्सालयों का निर्माण, कानूनों का स्पष्टीकरण सुधार तथा संकलन इत्यादि महत्वपूर्ण परिवर्तन होने लगे |
  • प्रबोधन के प्रभाव के कारण ही राज्य को प्रगति का मुख्य उपकरण समझा जाने लगा चाहे वह मॉन्टेस्क्यू के सिद्धांतों पर आधारित सीमित राजतंत्र हो अथवा वाल्टेयर के सिद्धांत पर आधारित प्रबुद्ध निरंकुशता या फिर रूसो के सिद्धांत पर आधारित गणतंत्र राज्य |
  • राज्य की इन्हीं तीन परिकल्पनाओं को सामाजिक कल्याण की प्रमुख गारंटी माना गया | अब लोग अपनी रक्षा के लिए प्रबुद्ध राज्य पर आश्रित हो गए तथा प्रगति की प्रत्येक आशा राजनीतिक सुधार शिक्षा और प्रबंध इत्यादि के निर्माण पर निर्भर रहने लगी |

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