समाजशास्त्र (सोशियोलॉजी) की परिभाषा और क्षेत्र 1 best notes

समाजशास्त्र (सोशियोलॉजी) की परिभाषा

सोशियोलॉजी
  • शाब्दिक अर्थ की दृष्टि से विचार करने पर हम पाते हैं कि समाजशास्त्र दो शब्दों से मिलकर बना है जिनमें से पहला शब्द ‘सोशियस’ लैटिन भाषा से तथा दूसरा शब्द ‘लोगस’ ग्रीक भाषा से लिया गया है |
  • सोशियस का अर्थ है समाज और लोगस का शास्त्र इस प्रकार समाजशास्त्र का शाब्दिक अर्थ समाज का शास्त्र या समाज का विज्ञान है |
  • जॉन स्टूअर्ट मिल ने सोशियोलॉजी के स्थान पर इथोलॉजी शब्द को प्रयुक्त करने का सुझाव दिया और कहा कि सोशियोलॉजी दो भिन्न भाषाओं की एक अवैध संतान है लेकिन अधिकांश विद्वानों ने मिल के सुझाव को नहीं माना |
  • 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से हरबर्ट स्पेंसर ने समाज के क्रमबद्ध अध्ययन का प्रयत्न किया और अपनी पुस्तक का नाम सोशियोलॉजी रखा |
  • सोशियोलॉजी शब्द की उपयुक्तिता के संबंध में आपने लिखा है कि प्रतीकों की सुविधा एवं सूचकता उनकी उत्पत्ति संबंधी वैधता से अधिक महत्वपूर्ण है स्पष्ट है कि शाब्दिक दृष्टि से समाजशास्त्र का अर्थ समाज (सामाजिक संबंधों) का व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध ढंग से अध्ययन करने वाले विज्ञान से है |
  • जब हम इस प्रश्न पर विचार करते हैं कि समाजशास्त्र क्या है तो विभिन्न समाज शास्त्रियों के दृष्टिकोण में भिन्नता देखने को मिलती है लेकिन इतना अवश्य है कि अधिकांश समाजशास्त्री समाजशास्त्र को ‘समाज का विज्ञान’ मानते हैं |
  • समाजशास्त्र का अर्थ स्पष्ट करने की दृष्टि से विभिन्न विद्वानों ने समय-समय पर विचार व्यक्त किए हैं |
  • उनके द्वारा दी गई समाजशास्त्र की परिभाषा को निम्नलिखित चार भागों में बांटा जा सकता है-
    • समाजशास्त्र समाज के अध्ययन के रूप में
    • समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों के अध्ययन के रूप में
    • समाजशास्त्र समूहों के अध्ययन के रूप में
    • समाजशास्त्र सामाजिक अंतः क्रिया के अध्ययन के रूप में

1-समाजशास्त्र समाज के अध्ययन के रूप में

  • वार्ड के अनुसार समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है |
  • गिड्डिंग्स के अनुसार समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है आपने ही अन्यत्र लिखा है कि समाजशास्त्र समाज का एक समग्र इकाई के रूप में व्यवस्थित वर्णन एवं व्याख्या है |
  • ओडम के अनुसार समाजशास्त्र का वह विज्ञान है जो समाज का अध्ययन करता है इन परिभाषा के आधार पर यह तो स्पष्ट है कि समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है परंतु यहां एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि समाजशास्त्र किस समाज का अध्ययन करता है मानव समाज या पशु समाज या अथवा दोनों का |

2-समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों के अध्ययन के रूप में

  • जहां कुछ विद्वानों ने समाजशास्त्र को समाज का विज्ञान माना है वहीं कुछ अन्य ने इसे सामाजिक संबंधों का व्यवस्थित अध्ययन कहा है लेकिन समाज के विज्ञान और सामाजिक संबंधों के अध्ययन में कोई अंतर नहीं है इसका कारण यह है कि सामाजिक संबंधों की व्यवस्था को ही समाज के नाम से पुकारा गया है |

3-समाजशास्त्र समूहों के अध्ययन के रूप में

  • नोब्स हाइन तथा फ्लेमिंग के अनुसार समाजशास्त्र समूह में लोगों का वैज्ञानिक और व्यवस्थित अध्ययन है इसका तात्पर्य है कि समाजशास्त्र व्यवहार के उन प्रतिमान ओं की ओर ध्यान देता है जो संगठित समुदायों में रहने वाले लोगों में पाए जाते हैं |

4-समाजशास्त्र सामाजिक अंतः क्रिया के अध्ययन के रूप में

  • कुछ समाजशास्त्री समाजशास्त्र को सामाजिक अंतः क्रिया के अध्ययन के रूप में परिभाषित करते हैं |
  • इनकी मान्यता है कि सामाजिक संबंधों की बजाय सामाजिक अंतः क्रियाएं समाज का वास्तविक आधार है |
  • सामाजिक संबंधों की संख्या इतनी अधिक है कि उनका ठीक से अध्ययन किया जाना बहुत ही कठिन है | अतः समाजशास्त्र में सामाजिक अंतर क्रियाओं का अध्ययन किया जाना चाहिए |
  • अंतः क्रिया का तात्पर्य दो या दो से अधिक व्यक्तियों या समूहों का जागरूक अवस्था में एक दूसरे के संपर्क में आना और एक दूसरे के व्यवहारों को प्रभावित करना है |
  • सामाजिक संबंधों के निर्माण का आधार अंतः क्रिया ही है यही कारण है कि समाजशास्त्र को सामाजिक अंतर क्रियाओं का विज्ञान माना गया है |

समाजशास्त्र का क्षेत्र

  • इनकल्स कहते है कि समाजशास्त्र परिवर्तनशील समाज का अध्ययन करना है इसलिए समाजशास्त्र के अध्ययन की ना तो कोई सीमा निर्धारित की जा सकती है और ना ही इसके अध्ययन क्षेत्र को बिल्कुल स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जा सकता है |
  • क्षेत्र का तात्पर्य यह है कि यह विज्ञान कहां तक फैला हुआ है अन्य शब्दों में क्षेत्र का अर्थ उन संभावित सीमाओं से है जिनके अंतर्गत किसी विषय विज्ञान का अध्ययन किया जा सकता है |
  • समाजशास्त्र के विषय क्षेत्र के संबंध में विद्वानों के मतों को मुख्यतः दो भागों में बांटा जा सकता है-
  • 1 –स्वरूपात्मक अथवा विशिष्टात्मक संप्रदाय तथा 2 –समन्वयात्मक संप्रदाय
  • प्रथम मत या विचारधारा के अनुसार समाजशास्त्र एक विशेष विज्ञान है और द्वितीय विचारधारा के अनुसार समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान है इनमें से प्रत्येक विचारधारा को हम यहां स्पष्ट करने का प्रयत्न करेंगे |

1-स्वरूपात्मक अथवा विशिष्टात्मक संप्रदाय

  • इस संप्रदाय के प्रवर्तक जर्मन समाजशास्त्रीय जॉर्ज सिमेल है इस संप्रदाय से संबंधित अन्य विद्वानों में वीरकांत, वान विज, मैक्स वेबर आदि प्रमुख है|
  • इस विचारधारा से संबंधित समाज शास्त्रियों की मान्यता है कि अन्य विज्ञानों जैसे राजनीतिशास्त्र, भूगोल, अर्थशास्त्र, इतिहास, भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र आदि के समान समाजशास्त्र भी एक स्वतंत्र एवं विशेष विज्ञान है |
  • जैसे प्रत्येक विज्ञान की अपनी कोई प्रमुख समस्या या सामग्री होती है जिसका अध्ययन उसी शास्त्र के अंतर्गत किया जाता है |
  • उसी प्रकार समाजशास्त्र के अंतर्गत अध्ययन की जाने वाली भी कोई मुख्य सामग्री या समस्या होनी चाहिए ऐसा होने पर ही समाजशास्त्र एक विशिष्ट एवं स्वतंत्र विज्ञान बन सकेगा और इसका क्षेत्र निशचित हो सकेगा |
  • ऐसी दशा में समाजशास्त्र एक खिचड़ी शास्त्र बन जाएगा | समाजशास्त्र को एक विशिष्ट विज्ञान बनाने के लिए यह आवश्यक है कि इसके अंतर्गत सभी प्रकार के सामाजिक संबंधों का अध्ययन नहीं करते इन संबंधों के विशिष्ट स्वरूपों का अध्ययन किया जाए |
  • सामाजिक संबंधों के स्वरूप आत्मक पक्ष पर जोर देने के कारण इस संप्रदाय को स्वरूपात्मक संप्रदाय कहा जाता है |

2-समन्वयात्मक संप्रदाय

  • इस संप्रदाय के प्रमुख समर्थकों में सोरोकिन दुर्खीम हॉब हाउस तथा गिन्सबर्ग के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है जो समाजशास्त्र को एक विशिष्ट विज्ञान बनाने के बजाय एक सामान्य विज्ञान बनाने के पक्ष में है |
  • इन विद्वानों के अनुसार समाज के संबंध में संपूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए समाजशास्त्र के क्षेत्र को केवल सामाजिक संबंधों के स्वरूपों तक सीमित नहीं रखा जा सकता |
  • इसे तो संपूर्ण समाज का सामान्य अध्ययन करना है समाज की प्रकृति जीवधारी शरीर के समान है जिस के विभिन्न अंग एक दूसरे के साथ घनिष्ठ रूप से संबंधित है और एक अंग में होने वाला कोई भी परिवर्तन दूसरे अंगों को प्रभावित किए बिना नहीं रह सकता |
  • अतः समाज को समझने के लिए उसके विभिन्न इकाइयों या अंगो के पारस्परिक संबंध को समझना अत्यंत आवश्यक है |
  • यह कार्य उसी समय हो सकता है जब समाजशास्त्र को एक सामान्य विज्ञान बनाया जाए इसके क्षेत्र को काफी व्यापक रखा जाए | समाजशास्त्र को एक सामान्य विज्ञान बनाने के पक्ष में एक अन्य तर्क यह दिया गया है कि प्रत्येक सामाजिक विज्ञान के द्वारा समाज के किसी एक भाग्य पक्ष का अध्ययन किया जाता है |
  • उदाहरण के रूप में राजनीति शास्त्र द्वारा समाज के राजनीतिक जीवन का ही अध्ययन किया जाता है | इस प्रकार अर्थशास्त्र के द्वारा आर्थिक जीवन का अध्ययन किया जाता है |
  • ऐसा कोई भी सामाजिक विज्ञान नहीं है जो सामाजिक जीवन के सभी पक्षों का यह संपूर्ण समाज का समग्र रूप में अध्ययन करता हो | अतः समाजशास्त्र को एक सामान्य विज्ञान के रूप में यह कार्य करना है |
  • ऐसा होने पर ही समाज की वास्तविक प्रकृति को समझा जा सकता है | इसके अभाव में समाज के संबंध में हमारा ज्ञान काफी संकुचित और एकाकी हो जाएगा वास्तव में समाजशास्त्र का लोगों को सामाजिक जीवन की सामान्य अवस्थाओं से परिचित कराने की दृष्टि से महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है और उसी समय संभव है जब इस क्षेत्र को एक सामान्य विज्ञान के रूप में विस्तृत किया जाए |

See Also..

Social Control

राष्ट्रकूट साम्राज्य