हर्षवर्धनऔर उसका साम्राज्य Useful notes 2023

पुष्यभूति वंश

हर्षवर्धन
इतिहास के इस टॉपिक में आप हर्षवर्धन और उसके साम्राज्य के बारे में पड़ेंगे |
  • इस वंश का संस्थापक पुष्यभूति था | इसी के नाम पर यह पुष्यभूति वंश के नाम से विख्यात हुआ |
  • पुष्यभूति ने गुप्त राजाओं की दुर्बलता का लाभ उठाकर पूर्वी पंजाब में अपनी सत्ता स्थापित कर ली तथा थानेश्वर को अपनी राजधानी बनाया |

प्रभाकर वर्धन

  • वर्धन वंश की शक्ति व प्रतिष्ठा का संस्थापक प्रभाकर वर्धन था | उसे हूण हरिण केसरी (हूणरूपी हरिन के लिए सिंह समान), सिंधुराज (सिंधु राज्य के लिए ज्वर के समान), गुर्जर प्रजागर (गुर्जरों की नींद हराम करने वाला) गांधारीपगंध द्विपकूथास्तिजवारो (गांधार के राजा रूपी सुगंधीराज के लिए महान हस्तज्वर घातक महामारी के समान ),चंचलता को नष्ट करने वाला एवं मालवलक्ष्मीलतापरशु (मालवा के लक्ष्मी रूपी लता के लिए कुल्हाड़ी के समान) बताया गया है |
  • वह स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए प्रभाकर वर्धन ने नौकरियों से वैवाहिक संबंध स्थापित किए |

राज्यवर्धन

  • प्रभाकर वर्धन की मृत्यु के पश्चात राज्यवर्धन थानेश्वर के राज्य सिंहासन पर बैठा | उसी समय उसे समाचार मिला कि बंगाल के शासक शशांक और मालवा के शासक देवगुप्त ने मिलकर कन्नौज पर आक्रमण किया है तथा ग्रहवर्मन की हत्या कर राज्यश्री को कैद कर लिया है |
  • इस घटना की सूचना पाकर राज्यवर्धन कन्नौज की सुरक्षा के लिए आगे बढ़ा उसने देवगुप्त की सेना को पराजित कर दिया परंतु शशांक बंगाल का गौड़ शासक ने विश्वासघात करके उसकी हत्या कर दी |

हर्षवर्धन

  • हर्षवर्धन पुष्यभूति वंश का सर्वाधिक प्रतापी राजा था | हर्षवर्धन का जन्म 591 ईसवी के लगभग हुआ था | वह प्रभाकरवर्धन व यशोमती का पुत्र था | हर्षवर्धन का बड़ा भाई राज्यवर्धन था |
  • राज्यवर्धन की हत्या के पश्चात 606 ईसवी में 16 वर्ष की आयु में हर्षवर्धन थानेश्वर का शासक बना | सिन्हासन ग्रहण करने के पश्चात उसने शशांक से प्रतिशोध लेने की प्रतिज्ञा की तथा अपनी बहन की सुरक्षा के लिए वह कन्नौज की ओर बढ़ा |
  • मार्ग में उसे कामरूप के राजा भास्करवर्मन का दूत हंसबेग मिला, जिसने हर्षवर्धन के समक्ष अपने राजा की ओर से मित्रता का प्रस्ताव रखा, जिसे हर्ष ने सहर्ष स्वीकार कर लिया |
  • आगे बढ़ने पर उसे मंडी से सूचना मिली कि राज्यश्री कैद से मुक्त होकर विंध्याचल चली गई है | आचार्य दिवाकर मित्र की सहायता से उसने राज्यश्री को उस समय खोज निकाला, जब वह सती होने जा रही थी |
  • हर्ष उसे वापस कन्नौज ले आया | ग्रहवर्मन की हत्या के पश्चात उसका कोई उत्तराधिकारी नहीं होने पर कन्नौज के मंत्रियों व राज्यश्री की सहमति से हर्ष कन्नौज का शासक बन गया |
  • हर्ष ने कन्नौज को राजधानी बनाया, जहां से उसने चारों ओर अपना प्रभुत्व फैलाया | यहां प्रदेश छठी सदी के उत्तरार्ध से अचानक राजनीतिक उत्कर्ष पर पहुंच गया था | हर्ष के समय से लेकर कन्नौज का राजनीतिक शक्ति से केंद्र के रूप में उभरना उत्तर भारत में सामंत युग के आगमन का सूचक था |
  • कन्नौज का क्षेत्र दोआब के मध्य में स्थित था | सातवीं सदी में कन्नौज की उचित ढंग से किलाबंदी की गई | हर्ष के शासन काल का आरंभिक इतिहास बाणभट्ट से ज्ञात होता है |
  • चीनी यात्री व्हेनसांग ईसा की सातवीं सदी में भारत आया और लगभग 15 वर्ष तक भारत में रहा | व्हेनसांग के अनुसार उसकी सेना में 60000 हाथी तथा एक लाख घोड़े थे |
  • हर्ष सूर्य एवं शिव का उपासक था | हर्ष का दूसरा नाम शिलादित्य था | उसको भारत का अंतिम हिंदू सम्राट कहा गया है | उसका राज्य कश्मीर को छोड़कर संपूर्ण उत्तर भारत तक विस्तृत था |
  • पूर्वी भारत में उसे शैव शासक से युद्ध करना पड़ा | दक्षिण की ओर हर्ष के अभियान को नर्मदा के तट पर चालुक्य वंश के राजा पुलकेशिन द्वितीय ने रोक दिया था |

प्रशासन

  • हर्ष के समय में शासन व्यवस्था का स्वरूप राजतंत्रआत्मक था | राजा अपनी देवीय उत्पत्ति में विश्वास करता था |
  • राज्य प्रशासनिक सुविधा के लिए ग्राम, विषय, भुक्ति तथा राष्ट्र में विभाजित था | हर्ष ने पदाधिकारियों को शासन पत्र के द्वारा जमीन देने की प्रथा चलाई थी |
  • हर्ष कालीन ताम्रपत्र में केवल 3 करो का उल्लेख मिलता है- भाग, हिरण्य तथा बली | भागकर भूमि कर था | जो राज्य की आय का मुख्य साधन था तथा कृषको से उनकी उपज का छठा भाग लिया जाता था |
  • हिरण कर नगद लिया जाता था जिसे संभवत व्यापारी देते थे |
  • बली कर के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं है संभव है कि यह एक प्रकार का धार्मिक कर रहा होगा |
  • ह्वेनसांग के अनुसार देश के कानून में अपराध के लिए कड़ी सजा का प्रावधान था | ह्वेनसांग हर्ष की सेना को चतुरंगिणी कहता था | हर्ष की दो तांबे की मुद्राएं नालंदा व सोनीपत से प्राप्त हुई है |
  • सोनीपत की मुद्रा पर शिव के वाहन नंदी का चित्रण है |
  • नालंदा की मुद्रा पर श्रीहर्ष का नाम लिखा है और उसे माहेश्वर, सर्वभोम व महाराजाधिराज कहा गया है |

ह्वेनसांग का विवरण

  • हर्ष के शासन काल का महत्व चीनी यात्री ह्वेनसांग के भ्रमण को लेकर है | वह चीन से 629 ईसवी में चला और अनेक स्थानों पर भ्रमण करते हुए भारत पहुंचा |
  • इसने नालंदा महाविद्यालय में अनेक वर्षों तक अध्ययन किया | आचार्य शीलभद्र हर्ष के समय नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति थे |
  • ह्वेनसांग के प्रभाव में आकर हर्ष बौद्ध धर्म का महान समर्थक हो गया | उक्त चीनी विवरण से ज्ञात होता है कि उस समय पाटलिपुत्र तथा वैशाली पतन की अवस्था में थे |
  • ह्वेनसांग ने शुद्र को कृषक कहा है | इस यात्री ने मेहतर चांडाल आदि अछूतों का वर्णन किया है | वह गांव के बाहर बसते थे और लहसुन प्याज खाते थे |

बौद्ध धर्म और नालंदा

  • सबसे विख्यात केंद्र नालंदा बिहार महाविहार था जहां बौद्ध भिक्षुओं को शिक्षित करने के लिए एक बड़ा विश्वविद्यालय था | ऐसा कहा गया है कि इस महाविहार में 10000 छात्र थे जिसमें सभी बौद्ध भिक्षु थे |
  • उन्हें महायान संप्रदाय का बौद्ध दर्शन पढ़ाया जाता था | एक अन्य चीनी यात्री इत्सिंग 670 ईसवी में नालंदा आया | उसके अनुसार इस महाविहार में केवल 3000 भिक्षु रहते थे |
  • व्हेनसांग के अनुसार नालंदा विश्वविद्यालय का भरण पोषण 100 गांव के राजस्व से होता था | इत्सिंग ने इस संख्या को बढ़ाकर 200 कर दिया है |
  • हर्ष की धार्मिक नीति सहनशील थी वह आरंभिक जीवन में शैव था | परंतु धीरे-धीरे बौद्ध के प्रभाव से उसने महायान के सिद्धांतों के प्रचार के लिए कन्नौज में एक विशाल सम्मेलन आयोजित किया |
  • सम्मेलन में शास्त्रार्थ का आरंभ व्हेनसांग ने किया | कन्नौज के बाद उसने प्रयाग में महासम्मेलन बुलाया जहां हर्ष ने अपने शरीर के वस्त्रों को छोड़कर सभी वस्तुओं को दान कर दिया |
  • बाणभट्ट ने अपने आश्रय दाता के आरंभिक जीवन का चित्र हर्षचरित नामक पुस्तक में किया है |

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