उत्तर भारत-पाल, प्रतिहार, राष्ट्रकूट साम्राज्य 750-927 ईसवी Best Notes

पाल

पाल
  • आठवीं शताब्दी के प्रारंभ में शैल वंश के एक राजा ने पौंड्र या उत्तरी बंगाल पर अधिकार कर लिया |
  • कश्मीर नरेश ललितादित्य मुक्तापीड और कन्नौज नरेश यशोवर्मन ने भी बंगाल पर आक्रमण किया था |
  • कामरूप (असम) नरेश हर्ष देव ने अवसर पाकर बंगाल को विजित कर लिया | अतः एक दृढ़ शासन शक्ति के अभाव में बंगाल अव्यवस्था और अराजकता का केंद्र हो गया |
  • आक्रमणों के इस क्रम में बंगाल में चारों और अशांति एवं अव्यवस्था उत्पन्न कर दी | जिससे परेशान होकर सभी सरदारों और जनता ने मिलकर गोपाल नामक व्यक्ति को अपना राजा चुना तथा उसे संपूर्ण बंगाल का शासक स्वीकार कर लिया गया |

गोपाल 750-770ईसवी

  • पाल साम्राज्य की स्थापना 750 ईसवी में गोपाल ने कि तिब्बती लामा व इतिहासकार तारा नाथ के अनुसार गोपाल ने ओदंतपुरी में एक बौद्ध मठ का निर्माण करवाया था |
  • आठवीं सदी में बंगाल में जो आंतरिक अव्यवस्था फैली हुई थी उसे मत्स्य न्याय कहा गया है |

धर्मपाल 770-810 ईसवी

  • 770 ईसवी में गोपाल की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र धर्मपाल राजा बना | उसने 810 ईसवी तक शासन किया |
  • धर्मपाल की महत्वपूर्ण सफलता कन्नौज के शासक इंद्रायुध को पराजित कर चक्रायुध को अपने संरक्षण में कन्नौज की गद्दी पर बैठना पड़ा |
  • 11 वीं सदी में गुजराती कवि सोडल ने धर्मपाल को उत्तरापथ स्वामी की उपाधि से संबोधित किया है | धर्मपाल एक उत्साही बौद्ध समर्थक था | उसके लेखों में उसे परमसौगात कहा गया है |
  • उसने विक्रमशिला व सोमपुरी (पहाड़पुर) में प्रसिद्ध विहार की स्थापना की | उसकी राज्यसभा में प्रसिद्ध बौद्ध लेखक हरीभद्र सूरी को स्थान प्राप्त था |
  • धर्मपाल ने प्रसिद्ध विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना भागलपुर (बिहार) में की और नालंदा विश्वविद्यालय बिहार का पुनरुद्धार करवाया |
  • उसने नालंदा विश्वविद्यालय के व्यय की पूर्ति के लिए 200 गांव के राजस्व को दान में दे दिया था |
  • धर्मपाल को राष्ट्रकूट का राजा ध्रुव से पराजित होना पड़ा इससे पहले ध्रुव प्रतिहार राज्य को भी पराजित कर चुका था |

देव पाल 810-850 ईसवी

  • धर्मपाल का पुत्र देव पाल अपने पिता की मृत्यु के उपरांत 810 ईसवी में राजा बना |
  • उसने प्रगज्योतिषपुर (असम) और उड़ीसा के कुछ भागों को अपने साम्राज्य में मिला लिया तथा प्रतिहार शासक मिहिरभोज को पराजित किया |
  • देव पाल ने मुंगेर को अपनी राजधानी बनाया था तथा परम सौगात की उपाधि धारण की |
  • उसने जगरहार (जलालाबाद) के प्रसिद्ध विद्वान वीर देव को नालंदा बिहार का प्रधानाचार्य नियुक्त किया था |
  • आठवीं सदी के मध्य से लगभग 100 वर्षों तक पूर्वी भारत पर पाल शासकों का वर्चस्व रहा |
  • सुलेमान नामक एक अरब व्यापारी ने 9 वीं सदी के मध्य में भारत की यात्रा की थी | उस ने पाल राज्य को रूहमा या धर्म (यानी धर्मपाल का संक्षिप्त रूप) कहां है |
  • महिपाल प्रथम को पाल वंश का द्वितीय संस्थापक कहा जाता है | पाल शासक बौद्ध ज्ञान विज्ञान व धर्म के महान संरक्षक थे |
  • पाल शासकों का तिब्बत के साथ घनिष्ठ सांस्कृतिक संबंध भी था |
  • संत रचित और दीपांकर (जिसे आतिश कहा जाता था) जैसे प्रमुख बौद्ध विद्वानों को तिब्बत में आमंत्रित किया गया और उन्होंने वहां बौद्ध धर्म के एक नए रूप का प्रचार किया |
  • दक्षिण पूर्व एशिया के साथ वालों के व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध थे | दक्षिण पूर्व एशिया में शैलेंद्र वंश के साम्राज्य का वर्चस्व था |
  • उनका साम्राज्य मलाया, जावा, सुमात्रा और आसपास के द्वीपों तक फैला हुआ था | शैलेंद्र शासक बौद्ध थे |
  • उन्होंने अपने कई दूत पाल दरबार में भेजें तथा पाल शासक से नालंदा में एक बिहार बनाने की अनुमति मांगी |

प्रतिहार

  • प्रतिहार अग्निकुल के राजपूतों में सर्वाधिक प्रसिद्ध वंश था | ग्वालियर प्रशस्ति में इसे राम के छोटे भाई लक्ष्मण का वंशज बताया गया है |
  • इस वंश की स्थापना हरिश्चंद्र नामक राजा ने की किंतु इस वंश का प्रथम वास्तविक शासक नागभट्ट प्रथम था |
  • प्रतिहारो को गुर्जर प्रतिहार भी कहा जाता है | प्रतिहार साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक और इस वंश का महानतम शासक भोज था |
  • गुर्जर जाति का सर्वप्रथम उल्लेख पुलकेशिन द्वितीय के ऐहोल अभिलेख में हुआ है | उसने प्रतिहार साम्राज्य का पुनर्निर्माण किया तथा लगभग 838 ईसवी में कन्नौज पर फिर से अधिकार कर लिया |
  • यह नगर लगभग एक सदी तक प्रतिहार साम्राज्य की राजधानी रहा | भोज 836-885 विष्णु का भक्त था तथा उसने आदि वराह का विरुद धारण किया था |
  • उसके कुछ सिक्कों पर आदीवाराह शब्द अंकित है परमार से उसका अंतर बताने के लिए उसे मिहिरभोज भी कहा जाता है |
  • बगदाद निवासी अल मसूदी ने 915-916 ईस्वी में गुजरात की यात्रा की थी | उसने गुर्जर प्रतिहार राज्य को अल जुजूर कहां है |
  • अल मसूदी बताता है कि अल जूजूर के साम्राज्य में 18 लाख गांव ,नगर और ग्रामीण क्षेत्र के राजा की सेना में 4 चमुए (डिवीजन) थी |
  • प्रत्येक चमू में 7 से 900000 लोग थे | उसके पास युद्ध के लिए केवल 2000 प्रशिक्षित हाथी थे |
  • उसकी अश्वारोही सेना देश में सर्वश्रेष्ठ थी | संस्कृत का महान कवि और नाटककार राजशेखर भोज के पौत्र महिपाल के दरबार में रहता था |
  • इसने इसे रघुकुल तिलक और रघुकुल ब्राह्मणी कहा था | 915 से 918 ईसवी के बीच राष्ट्रकूट राजा इंद्र तृतीय ने कन्नौज पर आक्रमण किया तथा इस नगर को नष्ट कर दिया | 963 ईसवी में एक अन्य राष्ट्रकूट राजा कृष्ण तृतीय ने उत्तर भारत पर आक्रमण कर प्रतिहार शासक को परास्त कर दिया |

राष्ट्रकूट

दंती दुर्ग

  • इस राज्य की स्थापना दंती दुर्ग ने की थी | इसने आधुनिक सोलापुर के निकट मान्य खेत या मालखेड़ को अपनी राजधानी बनाया | दंती दुर्ग ने उज्जैन में हिरण्यगर्भ महायज्ञ किया | जिसने प्रतिहार राजा ने द्वारपाल का नाम किया था |

गोविंद तृतीय 793-814 ईसवी और अमोघवर्ष 814-878 ईसवी

  • गोविंद तृतीय 793 814 ईसवी और अमोघवर्ष 814 878 ईसवी संभवत सबसे महान राष्ट्रकूट शासक थे |
  • एक अभिलेख से ज्ञान होता है कि गोविंद तृतीय ने केरल पांडेय व चोल राजाओं को भयभीत कर दिया तथा पल्लवों को शक्तिहीन बना दिया |
  • गोविंद ने जयतुंगरप्रभृतवर्ष तृतीय की उपाधि धारण की थी | अमोघवर्ष 68 वर्षों तक शासन किया उसकी रुचि युद्ध की अपेक्षा धर्म व साहित्य में अधिक थी |
  • वह स्वयं भी एक लेखक था तथा उसे राजनीति विषय पर कन्नड़ भाषा की प्रथम कृति कवि राजमार्ग की रचना करने का श्रेय दिया जाता है |
  • इस के दरबार में जीनसेन एवं संकटआयन रहते थे | इन्होंने अमोघवृत्त की रचना की | अमोघ वर्ष के काल में अरब यात्री सुलेमान भारत आया था |

इंद्र तृतीय 915-927 ईसवी

  • 915 में महिपाल को पराजित करने और कन्नौज की प्रतिष्ठा को कम करने के बाद इंद्र तृतीय 915 927 ईसवी अपने समय के सबसे सकता है |
  • सबसे शक्तिशाली राजा के रूप में सामने आया इसके शासनकाल में अरब यात्री अल मसूदी भारत आया था |
  • इस राजवंश का अंतिम प्रतापी राजा कृष्ण तृतीय 934 996 हुआ | कृष्ण तृतीय ने चोल शासक परांतक प्रथम को 949 ईसवी में परास्त कर चोल साम्राज्य के उत्तरी भाग पर अधिकार कर लिया |
  • वह दक्षिण में रामेश्वरम की ओर बढ़ा और आसपास के प्रदेशों को जीतकर उसने वहां एक विजय स्तंभ स्थापित करवाया एवं एक मंदिर का भी निर्माण करवाया |
  • दक्कन में राष्ट्रकूट शासक शासन 10 वीं सदी के अंत तक लगभग 2 वर्षों तक कायम रहा | राष्ट्रकूट राजा कृष्ण प्रथम ने एलोरा का प्रसिद्ध शिव मंदिर नवी सदी में बनवाया था |
  • राष्ट्रकूट राजाओं ने मुस्लिम व्यापारियों को अपने राज्य में बसने की अनुमति दी और साथ ही इस्लाम के प्रचार की छूट दी गई |
  • तटवर्ती शहरों में प्रतिदिन इबादत प्रार्थना के लिए मुस्लिमों की अपनी मस्जिदे थी | इस संहिता की नीति से विदेशी व्यापार में सहायता मिली जिसने राष्ट्रकूट की समृद्धि बड़ी राष्ट्रकूट शासक कला और साहित्य के महान संरक्षक थे |
  • कन्नड़ साहित्य के त्रिरत्न पंपा ,पोन्ना ,रन्ना थे | प्रथम 2 विद्वानों का संरक्षक कृष्ण तृतीय था |
  • उनके दरबार में न केवल संस्कृत के विद्वान थे बल्कि अनेक ऐसे कवि और लेखक भी थे जो प्राकृत और अपभ्रंश में लिखते थे | यह दोनों भाषाएं अनेक आधुनिक भारतीय भाषाओं की जननी थी |

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