1Useful Notes:केंद्र राज्य संबंध

केंद्र राज्य संबंध

केंद्र राज्य संबंध
  • हम जानते हैं कि केंद्र राज्य संबंध भारतीय संविधान द्वारा देश में संघीय व्यवस्था की स्थापना की गई है परंतु निश्चय ही उसका रुझान एकात्मक व्यवस्था की ओर है कुछ आलोचकों का योग तो यहां तक कहना है कि संघ और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन इस प्रकार किया गया है कि राज्यों की स्थिति नगर पालिकाओं के समान हो गई है |
  • दूसरी ओर कुछ विद्वानों का ऐसा भी मानना है कि भारत वास्तव में एक संग है यद्यपि यहां केंद्र अन्य संघीय राज्य से अधिक शक्तिशाली है वास्तविक स्थिति के आकलन के लिए संघ और राज्यों के आपसी संबंधों की समीक्षा करना आवश्यक है |
  • इन संबंधों को हम मोटे तौर पर तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं वह है प्रशासकीय संबंध विधाई संबंध तथा वित्तीय संबंध |

विधाई संबंध तथा शक्तियों का बंटवारा

  • केंद्र एवं राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन संघीय व्यवस्था का सार है अमेरिका एवं कुछ अन्य संघों में मात्र केंद्र ही शक्तियों को सूचीबद्ध किया गया है और शेष शक्तियां राज्यों के लिए छोड़ दी गई है |
  • कनाडा और कुछ अन्य देशों में केंद्र और राज्यों की अलग-अलग शक्तियों की दो सूचियों की रचना की गई है इस प्रकार की शक्ति विभाजन व्यवस्था का स्वरूप कठोर होता है और आवश्यकता के अनुसार उसे लचीला नहीं बनाया जा सकता है इसलिए तीसरी सूची जिसे समवर्ती सूची भी करते हैं संविधानविदो उसकी व्यवस्था करने को उचित स्थान दिया है |
  • भारतीय संविधान में तीन सूचियों की पद्धति को अपनाया गया है संविधान की सातवीं अनुसूची में तीनों सूचियों का वर्णन किया गया है प्रथम सूची में उन विषयों का उल्लेख किया गया है जो संघीय महत्व वाले हैं इस कारण पूरे संघ में इन विषयों पर समान कानून होना अति आवश्यक है |
  • इन पर केवल केंद्रीय व्यवस्थापिका अर्थात संसद को ही अन्य विधाई शक्तियां प्राप्त है इसे संघ सूची कहा गया है तथा इस में 97 विषय शामिल है अनुसूची का आकार सबसे लंबा है राष्ट्र से लेकर सारे विषय रेलवे वायु मार्ग दातार व टेलीफोन से लेकर अफीम सिनेमा फिल्म प्रकृति तथा केंद्रीय विश्वविद्यालय भी शामिल है |
  • दूसरी सूची का नाम राज्य सूची है इसमें वे विषय शामिल है किए गए हैं जिन पर केवल राज्यों का ही एकाधिकार रहता है 42 वें संविधान संशोधन के पूर्व छात्र विषय थे परंतु 42 वें संविधान संशोधन द्वारा शिक्षा तथा न्यायालयों की स्थापना और संगठन को इस सूची से हटा कर समवर्ती सूची में शामिल कर दिया गया |
  • इस सूची में मुख्य विषय है सार्वजनिक व्यवस्था पुलिस प्रशासन जेल तथा स्थानीय शासन सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता से लेकर पशुपालन, भूमि प्रबंध, भूमि अधिकार, सिंचाई विधान मंडलों के विशेषाधिकार भूमि तथा भवन कर समाचार पत्रों को छोड़कर अन्य वस्तुओं पर बिक्री कर जल तथा स्थल मार्ग द्वारा ले जाए गए माल तथा यात्रियों पर वाहनों पर पशु तथा गायों पर कर चुंगी व्यवसाय तथा उपजीविका आदि पढ़कर भोग विलास की वस्तुओं पर कर इत्यादि इस सूची में दिए गए प्रत्येक विषय पर राज्य विधानमंडल को अन्य विधाई शक्ति प्राप्त है |
  • तीसरी सूची समवर्ती है इसमें सम्मिलित विषयों पर समस्त देश में समान कानून होना आवश्यक है परंतु यह अनिवार्य नहीं है इस कारण से यह विषय केंद्र और राज्य दोनों ही के क्षेत्राधिकार में आते हैं इसमें अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण विषय है |
  • शिक्षा संघ सरकार के निर्देशन में देश के किसी भी भाग में सशस्त्र सेनाओं की तैनाती न्याय प्रशासन और सर्वोच्च न्यायालयों के अतिरिक्त अन्य न्यायालयों की स्थापना और उनका संगठन जंगली जीव और पक्षियों की रक्षा जनसंख्या तथा परिवार नियोजन फौजदारी कानून और दंड प्रक्रिया श्रमिक संघ एवं श्रम संबंधी झगड़े वकालत एवं अन्य पेशे तथा इस सूची के विषयों में से किसी के बारे में फंसे इस सूची में सम्मिलित किसी भी संसद पर और राज्य विधानमंडल दोनों को कानून बनाने का अधिकार है|

अवशिष्ट शक्तियां (केंद्र राज्य संबंध)

  • वे शक्तियां अवशिष्ट शक्तियां कहलाती है जिनका उल्लेख किसी भी सूची में नहीं होता है संविधान निर्माता चाहे कितने ही सावधान और सतर्क क्यों ना रहे ऐसी व्यापक सूची का निर्माण संभव नहीं है जिसमें समस्त शासकीय शक्तियों का स्पष्ट उल्लेख हो वर्तमान की परिवर्तनशील परिस्थितियों में नित्य नई शक्तियों का निर्माण हो रहा है |
  • वर्तमान संघ राज्यों में संयुक्त राज्य अमेरिका स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रेलिया के संविधान इकाइयों को वशिष्ठ शक्तियां प्रदान करते हैं परंतु कनाडा का संविधान यह शक्ति केंद्र सरकार को प्रदान करता है |
  • संसद को यह भी अधिकार है कि वह किसी देश अथवा अंतरराष्ट्रीय संस्था के साथ की गई संधि करार अथवा उप संधि के लिए आवश्यक कानून का निर्माण करें इन सब का प्रभाव या है कि संघीय सरकार राज्यों की तुलना में सबल होगी |

संघ संसद की राज्यों के विषय के संबंध में विधि निर्माण की शक्ति

  • संसद उन विषयों पर भी कानून बना सकती है जो केवल राज्यों के क्षेत्राधिकार में है यदि राज्यसभा मतदान में भाग लेने वाले या उपस्थित सदस्यों के दो तिहाई बहुमत द्वारा यह प्रस्ताव पारित कर देती है कि वैसा करना राष्ट्रीय हित की दृष्टि से आवश्यक है तो संसद राज्य सूची में वर्णित किसी भी विषय पर कानून बना सकती है |
  • जब तक यह प्रस्ताव प्रभावी रहता है तब तक संसद उसमे वर्णित विषयों पर कानून बना सकती है इस विधि से जो भी विद्या निर्मित की जायेंगी उस प्रस्ताव की अवधि की समाप्ति के 6 माह पश्चात उस मात्रा में प्रभावहीन हो जाएगी जिसमें वह संसद के विधि निर्माण की सीमा से बाहर है |
  • यदि किसी राज्य में संवैधानिक व्यवस्था विफल हो जाए तो संवैधानिक विफलता से उत्पन्न आपात की घोषणा कर राष्ट्रपति संबंधित राज्य के लिए विधिया निर्मित करने की शक्ति संसद को दे सकता है |
  • संसद यदि चाहे तो इस शक्ति का सम प्रयोग करने की जगह पर राष्ट्रपति को इस बात का अधिकार दे सकती है कि वह किसी प्रतिनिधि को राज्य के लिए विधि निर्माण का अधिकार सौंप दें इस प्रकार जिन विधियों का निर्माण होगा वह घोषणा की कालावधी की समाप्ति के 1 वर्ष बाद अप्रवृत्त हो जाएगी |

संघ एवं राज्यों के प्रशासनिक संबंध

  • संघात्मक शासन व्यवस्था की सबसे कठिन समस्या संघ और इकाइयों के बीच प्रशासकीय संबंधों के समायोजन की होती है यदि संविधान में इस संबंध में स्पष्ट उपबंध ना हो तो दोनों को अपना दायित्व निभाने में कठिनाई होती है |
  • इसी कारण भारतीय संविधान निर्माताओं ने इसे संबंध में विस्तृत प्रावधानों की आवश्यकता महसूस की ताकि प्रशासकीय क्षेत्र में संघ और राज्यों के बीच किसी प्रकार के विवाद पैदा ना हो पाए साधारण तौर पर जिन विषयों पर संसद को विधि निर्माण का अधिकार है प्रशासकीय शक्ति केंद्र सरकार को प्रदान की गई है |
  • राज्य सूची के विषयों पर प्रशासकीय शक्ति राज्य सरकारों को प्राप्त है वर्तमान व्यवस्था में सीमा कर, केंद्रीय उत्पाद कर, आयकर, रेल पथ, डाकघर आदि का प्रशासन सीधे केंद्रीय शासन के अधिकारियों तथा कर्मचारियों के हाथ में है और शेष संगी विषयों का प्रशासन एवं केंद्रीय वीडियो को करने का कार्यभार सम्मानित राज्य अधिकारियों के हाथ में सौंपा गया है |
  • भारतीय संविधान में राष्ट्रपति को यह शक्ति प्रदान की है कि वह किसी संघीय विशेष को प्रकाश नाथ राज्य शासन को सौंप सकता है संघीय संसद भी संजीव विषयों के संबंध में राज्य के अधिकारियों को अधिकार प्रदान कर सकती है |
  • यह अवश्य है कि संघ संबंधी कार्यो को कराने में जो अतिरिक्त वह करना होगा उसका वह सरकार करेगी भारतीय संविधान का अनुच्छेद 250 स्पष्ट निर्देश देता है कि प्रत्येक राज्य को अपनी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग कुशलतापूर्वक करना होगा ताकि संसद द्वारा निर्मित वीडियो और अधिनियम का परिपालन निश्चित रूपेण हो सके इसका कारण यह है कि राज्य केंद्रीय विद्युत कार्य को रोकने में दिखलाए तथा उन कार्यों को संतोषजनक ढंग से करें |
  • भारत में केंद्र और राज्यों के प्रशासकीय संबंध को इस प्रकार संगठित किया गया है कि केंद्र सरकार राज्य की प्रशासन मशीनरी पर बहुत अधिक नियंत्रण रख सकती है |
  • राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति संघ सरकार अर्थात राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है संघ शासन का कर्तव्य होता है कि वह बाहर के आक्रमणों तथा आंतरिक उत्पादों एवं संकटों से राज्यों की रक्षा करें तथा यह देखे कि उनका प्रशासन संविधान की व्यवस्थाओं के अनुसार हो रहा है या नहीं |
  • इन कर्तव्यों का पालन करने में कभी-कभी केंद्र को विश्व युद्ध राज्य विषयों में भी हस्तक्षेप करना पड़ सकता है केंद्रीय शासन को संविधान द्वारा ऐसी कुछ शक्तियां दी गई है जिनकी सहायता से वह विभिन्न राज्यों की नीतियों का समन्वय कर सकता है उनके आपसी झगड़े का निपटारा कर सकता है |
  • कुछ ऐसे भी मामले हैं जिनका संबंध केंद्र एवं राज्य दोनों से है परंतु उनका नियम या निर्माण तो केवल राज्य द्वारा या मुख्यता राज्य केंद्र द्वारा होता है इन संघ एवं राज्यों में होने वाले सभी प्रकार के निर्वाचन ओं का अधीक्षण निर्देशन और नियंत्रण चुनाव आयोग द्वारा होता है |
  • जिसकी नियुक्ति संघ का राष्ट्रपति करता है संघ और राज्यों को विदाई तथा प्रशासकीय शक्तियों के कारण वितरण के ध्यानपूर्वक विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि संविधान एक ऐसे संघात्मक राज्य की स्थापना करता है जिसका उद्देश्य संघ राज्यों की तरह अनेकता में एकता स्थापित करना है |
  • भारतीय संविधान के निर्माता संघीय शासन की व्यवस्था के स्वामियों एवं खतरों से परिचित थे इसी कारण उनका जोर ऐसी संघात्मक व्यवस्था पर था जिससे एकता को बनाए रखने के पर्याप्त उपाय मौजूद हो |

संघ एवं राज्यों के वित्तीय संबंध

  • संघीय प्रणाली में वित्त की आदर्श व्यवस्था तो यह होनी चाहिए कि संघ और राज्य के राजस्व के स्रोतों को स्पष्ट रूप से अलग-अलग बांट दिया जाए तथा केंद्र और राज्य दोनों वित्तीय दृष्टि से अपने-अपने क्षेत्रों में स्वतंत्र हो किंतु वर्तमान में शायद ही ऐसा कोई देश हो जो इस आदर्श तक पहुंच सका हो संयुक्त राज्य अमेरिका ही एक आदर्श के सबसे निकट पहुंच सका है परंतु अन्य देशों में या तो केंद्र अपने कोष से राज्यों की सहायता करता है अथवा राज्य अपनी आय से केंद्रीय राजकोष को मदद देता है |
  • कनाडा और आस्ट्रेलिया में तो केंद्र ही इकाइयों की सहायता करता है परंतु स्विट्जरलैंड में इकाइयां संघ को अपनी आय का कुछ हिस्सा देने के लिए बाध्य होती है |
  • वित्तीय क्षेत्र में केंद्र और राज्यों के संबंधों का इतना विस्तार अन्य किसी संघात्मक संविधान में नहीं मिलता भारतीय संविधान द्वारा एक वित्त आयोग की व्यवस्था की गई है इसका प्रयोजन कुछ साधनों से होने वाली प्राप्ति ओं का केंद्र और राज्यों के बीच वितरण तथा समायोजन करना है |
  • भारत सरकार अधिनियम 1935 द्वारा भी इस समस्या को सुलझाने का अच्छा प्रयास किया गया था वित्तीय संबंधों के विषय में सबसे पहले इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि संविधान में करो के विषय अलग नहीं दिए गए हैं |
  • कर लगाने की शक्ति कानून बनाने की शक्ति के ही अंतर्गत आती है इस प्रकार जो विषय संघ सूची में है उन पर कर लगाने का अधिकार केंद्रीय सरकार को है तथा जो विषय राज्य सूची में है उन पर कर लगाने का अधिकार राज्य सरकारों को प्राप्त है |

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